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I am bihar, I am the history of India, I gave the world its first Republic
I nourished Buddha to enlightenment, I gave world its best ancient university
My son Chanakya was the father of Economics, Mahavir came out of my womb to found Jainism
My son Valmiki wrote Ramayan, the greatest Epic, Rishi Shushrut, the father of surgery, lived on my soil
My son Vatsayana wrote Kamasutra, the treatise of love
My son Ashoka was the greatest ruler of India, I gave birth to Aryabhatt, the great ancient mathematician
I gave Ashoka Chakra that adorns India's national flag, My son Dinkar is the national poet of India
I gave the world its first University, I gave India its first president
I am the land of festivals, I am brotherhood
I am the past, I am the future, I am opportunity, I am revolution, I am culture, I am heritage
I am love, I am inspiration, I am freedom, I am destiny, I am Bihar

जय बिहार


Tuesday, 11 March 2014

वाल्मीकि रामायण


महर्षि वाल्मीकि ने ही संस्कृत में रामायण की रचना की. उनके द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई. रामायण एक महाकाव्य है जो कि श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य से, कर्तव्य से, परिचित करवाता है. वाल्मीकि रामायण में भगवान राम को एक साधारण मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया है. एक ऐसा मानव, जिन्होंने संपूर्ण मानव जाति के समक्ष एक आदर्श उपस्थित किया. रामायण प्राचीन भारत का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है.
इंसान की अगर इच्छा शक्ति उसके साथ हो तो वह कोई भी काम बड़े आराम से कर सकता है. इच्छाशक्ति और दृढ़संकल्प इंसान को रंक से राजा बना देती है और एक अज्ञानी को महान ज्ञानी. भारतीय इतिहास में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी की जीवनकथा भी हमें दृढ़संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति अर्जित करने की तरफ अग्रसर करती है. कभी रत्नाकर के नाम से चोरी और लूटपाट करने वाले वाल्मीकि जी ने अपने संकल्प से खुद को आदिकवि के स्थान तक पहुंचाया और “वाल्मीकि रामायण” के रचयिता बने. आइए आज इन महान कवि की जीवन यात्रा पर एक नजर डालें.

दस्यु (डाकू) रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक रत्नाकर नाम का दस्यु था जो अपने इलाके से आने-जाने वाले यात्रियों को लूटकर अपने परिवार का भरण पोषण  करता था. एक बार नारद मुनि भी इस दस्यु के शिकार बने. जब रत्नाकर ने उन्हें मारने का प्रयत्न किया तो नारद जी ने पूछा – तुम यह अपराध क्यूं करते हो?

रत्नाकर: अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए?
नारद मुनि: अच्छा तो क्या जिस परिवार के लिए तुम यह अपराध करते हो वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार है ?

इसको सुनकर रत्नाकर ने नारद मुनि को पेड़ से बांध दिया और प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अपने घर चला गया. घर जाकर उसने अपने परिवार वालों से यह सवाल किया लेकिन उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कोई भी उसके पाप में भागीदार नहीं बनना चाहता.

घर से लौटकर उसने नारद जी को स्वतंत्र कर दिया और अपने पापों का प्रायश्चित करने की मंशा जाहिर की. इस पर नारद जी ने उसे धैर्य बंधाया और राम नाम जप करने का उपदेश दिया. लेकिन भूलवश वाल्मीकि राम-राम की जगह ‘मरा-मरा’ का जप करते हुए तपस्या में लीन हो गए. इसी तपस्या के फलस्वरूप ही वह वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामायण की महान रचना की.
संस्कृत का पहला श्लोक
महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी एक और घटना है जिसका वर्णन अत्यंत आवश्यक है. एक बार महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे. वह जोड़ा प्रेम करने में लीन था. पक्षियों को देखकर महर्षि वाल्मीकि न केवल अत्यंत प्रसन्न हुए, बल्कि सृष्टि की इस अनुपम कृति की प्रशंसा भी की. इतने में एक पक्षी को एक बाण आ लगा, जिससे उसकी जीवन -लीला तुरंत समाप्त हो गई. यह देख मुनि अत्यंत क्रोधित हुए और शिकारी को संस्कृत में कुछ श्लोक कहा. मुनि द्वारा बोला गया यह श्लोक ही संस्कृत भाषा का पहला श्लोक माना जाता है.

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

(अरे बहेलिये, तूने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है. जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी)

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